रेत सी ज़िंदगी 

ज़िंदगी रेत की तरह है 

हर रोज़ हाथ से फिसलती है 

हमें हमारे ख़ुशियों के लम्हे चुराने है 

अपना आशियाँ खुद सजाना है 

जो रेत हाथ में चिपकी हुई है 

आओ उसीमें हम अपना जहाँ बसाते है 

साजिदा