रातरानी
रात भी कुछ निराली है ,अपने मन की रानी है ।
आसमान के सारे तारे एक साथ निकलते है ।
किसिको हँसकर दिखाते है ,तो किसिको रोकर दिखाते है ।
प्रेमियों का प्रतीक बनकर चाँद भी तो आता है ।
कभी-कभी सताकर सबको बादलों में छिपता है ।
अनकही सी बातें सबकी सुनकर मन ही मन मुस्काता है ।
सुनसान सड़के भी तो सहमी-सहमी रहती है ।
जाने क्यूँ वो भी रात से यूँ डरती है ।
पौधों की तो बात न पूछो , चुपचाप से सोते है ।
हाथ अगर लग जाएँ किसिका तो सहमे से हो जाते है ।
आनी- जानी बंद होती है ,सड़के भी तो सोती है ।
फिर भी राज करे जो रात पर वो चाँद और सितारें है ।
साजिदा