एक सिख
बैठा था पंछी द्वार पे मेरे ,
जाने कुछ माँग रहा था पास मेरे ,
भाषा उसकी समझ ना पाऊँ ,
उलझन अब ये कैसे सुलझाऊँ ।
दाएँ देखा ,बाएँ देखा ,नज़र को घुमाके देखा ,
आँगन में नन्हा सा बालक खेलते देखा ।
बालक को समझे पंछी के बोल ,
बोला गाए पंछी मीठे बोल ,
ताकि आप दे दो उसे तोहफ़ा अनमोल ।
तोहफ़े में चाहे वो कुछ खाना ,
जाकर उसे है उसके बच्चों को खिलाना ।
आँखों में पानी मेरे आया ,
नन्हे बालक ने जब मुझे ये समझाया ।
साजिदा