बाग़ीचा
आते हो इस बाग़ीचे में खेलने सारे ,
देखते हो हमेशा खिलखिलाते मुझे सारे ।
कभी फूलों से तो कभी कलियों से खेलते हो सारे ,
तोड़कर उन्हो फूलों को बिखेरते हो सारे ।
दर्द मेरा क्यूँ जान सके ना सारे ?
हो तुम आसमान के तारे ,
पर हम भी है पौधों को प्यारे ।
निसर्ग से प्यार करना सिखाते है हम ,
हमारे सेहत का ख़याल क्यूँ नहीं रखते तुम ?
दिल बहलाने आते जो यहाँ ,
करके बेरंग हमें जाते हो कहाँ ।
साजिदा