महामारी ये प्रचण्ड है,

पूरा विश्व बंद है,

पशु-पक्षी स्वतंत्र हैं,

इंसान अपने घर में बंद हैं,

खुशनसीब ही तो हैं वो,

जो आज अपनों के संग हैं,

अमीरों की है जैसे छुट्टियां,

गरीबों की आंखें नम हैं,

थाली तो है हाथों में,

पर खाना रोज़ थोड़ा कम है,

भविष्य है ख़तरे में, स्कूल,

काॅलेज सारे बंद हैं,

अर्थव्यवस्था चरमरा रही,

ये समय रूपी बम है,

सुनसान सड़कें चारो ओर,

शहर विरान चारो ओर,

लोग मर रहे हैं चारो ओर,

दुख ही दुख है चारो ओर,

ऐसा सोचते क्यों हम हैं,

रात है तो दिन भी होगा,

यही तो प्रकृति का नियम है,

महामारीयां तो हैं सदियों से आती रहती,

लड़कर इनसे हमेशा विजयी होते आए हम हैं,

नज़रिया बदलो तो दिखेगा,

आसमान कितना आसमानी और प्रदूषण कितना कम है,

हवा में अब ज़हर नहीं, फूलों से आ रही सुगंध है,

ऐसा लगता है मानो,

कुछ दशक पहले के वापस आए मौसम हैं,

अगर गौर से सोचो तो शायद,

खुद को ठीक करने का ये पृथ्वी का अपना ही अनोखा ढंग है।