पता नही वो रिश्ता क्या था, जिसमे वो और मैं थे। नाम नही था उस बंधन का, जिसमे वो औऱ मैं थे।। जरूरी बस थी मुस्कान उसकी, आँसू जिसमे बस मेरे थे।। दर्द चुना मैंने अपने लिए, उसके बस खुशी मौके थे।। पता नही वो रिश्ता क्या था, जिसमे वो और मैं थे।। उसकी चाहत की खातिर, दुनिया से लड़ना की हिम्मत थी। बस एक उसी से नही लड़ पाया, जिसमे मेरी जान बसती थी।। पता नही वो रिश्ता क्या था, जिसमे वो और मैं बसते थे।। उसकी हर अदा पसन्द मुझे, नखरे सारे मंजूर थे मुझे। उसकी हर जिद पूरी करने को, अपनी जान भी कुछ कम लगे मुझे।। पता नही वो रिश्ता क्या था, जिसमे वो और मैं बसते थे।। दुनिया से लड़ने की थी हिम्मत, उसके गुस्से से था काँपता मैं। उसकी खुशी की दुआओ को, अपनी किस्मत मानता था मैं।। पता नही वो रिश्ता क्या था, जिसमे वो और मैं बसते थे।। उसके आँसू रास नही मुझे, उसकी मुस्कान प्यारी लगे। उसकी चाहत के आगे सारी, दुनिया की कुर्बानी छोटी मुझे।। पता नही वो रिश्ता क्या था, जिसमें वो और मैं बसते थे।। कुछ प्यार बताते हैं इसको, कुछ पागलपन भी कहते हैं। सनकी मूर्ख और सिरफिरा, जाने क्या क्या कहते हैं मुझे।। पर मैं न समझ पाया अब तक, वो बन्धन कैसा था उससे।। पता नही क्या रिश्ता था, जिसमें वो औऱ मै थे।।