
हो रहा मदहोश जमाना,
जाने किस एहसास में।
गूंज रही हैं बुलन्द आवाजें,
आज देश के हर भाग में।।
हो रहा है अत्याचार,
बिक रही आज़दियाँ।
रंग गयी सड़के अब तो,
खेल लहू की होलियां।।
मदहोशी मे चूर फिर भी,
सत्ता की किलकारियां।
मन्दिर मस्जिद मूर्तियों से,
व्यस्त फिर भी आवाम यहाँ।।
जाने किस लेनिन की देखो,
लड़ी जा रही लड़ाई यहां।
सुलग रहा देश दुविधाओं से,
बज रही फिर भी तालिया
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