काव्य पुस्तकविमोह” (२०२०) महाभारत के विषय को ले कर लिखी गई है और कवयित्री डॉ. दीप्ति प्रिया ने परंपरागत विषय के मूल को जीवित रखते हुए परिपक्वता से, मनोवैज्ञानिक अध्यात्मिक दृष्टिकोण को नया आयाम दिया है। जहाँ पहले से ही बहुत सी उत्कृष्ट और अतुलनीय काव्य पुस्तक महाभारत के विषय को ले कर लिखी हुई है, जैसे मैथिलीशरण गुप्त जी की लिखी हुई जयद्रथ वध” (१९१०); दिनकर जी कीरश्मिरथी” (१९५२); धर्मवीर भारती जी द्वारा रचित काव्यनाटक अँधा युग” (१९५४); और भी बहुत सारी ऐसी रचनाएं हैं जो दशकों से बाहुल्य को प्रभावित करती रही हैं, वहीं आज के दौर में ऐसी किसी और समान्तर रचना की कल्पना करना भी मुश्किल है। साहित्य में विचारों को ले कर आना एक कठिन काम है। परन्तु काव्य संग्रह विमोह को पढ़कर ऐसा लगा की कवयित्री डॉ. दीप्ति प्रिया में वही क्षमता है, वही विचारों की सघनता है जैसा की हमें दशकों पुराने कवियों द्वारा लिखी हुई पुस्तकों में मिलती है।


विमोहकी धारणा और महाभारत का विषय ले कर विमोह के उन्मूलन पर स्पष्टता के साथ विवरणात्मक चर्चा इस पुस्तक को विशिष्ट बनाता है और डॉ. दीप्ति प्रिया के क्षमता, संकल्प, और साधना को भी दर्शाता है, उन्होंने विषय के साथ सही मायने में न्याय करते हुए बहुत ही सराहनीय ढंग से अपना विशिष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। महाभारत के विषय पर काव्य पुस्तकों के साथ दार्शनिक व्याख्या भी बहुत सारी हैं, इन सब की धारणाओं से परे काव्य पुस्तकविमोह में दृष्टांत और अन्योक्ति के साथ जो मनोवैज्ञानिक अध्यात्मिक दृष्टिकोण है वह बहुत प्रभावशाली है और यह रचनाओं को विशेष बनाते हुए हिंदी में विचार साहित्य को विशिष्टता के साथ नया आयाम देता है।


विमोहजैसी उत्कृष्ट कृति के प्रकाशन के लिये कवयित्री और प्रकाशक को सहृदय धन्यवाद!!