वो रात क्या कुछ इस कदर वीरान थी ?

या कुछ लोगों की सोची समझी चाल थी ।


सड़क पर क्या कोई नहीं था ?

या तुम सबसे अनजान थी ?

तुम चीखी तो बहुत होगी,

पर शायद बहरों की बस्ती थी,

जहाँ किसी की कान नहीं थी ।


ना किसी ने सुना, ना रोका, ना टोका,

शायद तुम वहाँ किसी की पहचान नहीं थी ।


माँ, बहन, बेटी तुम किसी की उस वक़्त भी थी,

पर फर्क नहीं पड़ता,

क्योंकि तुम उन लोगों का मान नहीं थी ।


स्वयं के साथ होता तब वो गलत कहलाता,

तुम्हें इस सच्चाई की पहचान नहीं थी ।।