तमाशा


निकली गली से मैं,

सामने कुछ भीड़ थी।


सोचा शायद तमाशा होगा,

और तमाशा हुआ भी,

पर कलाकार सच्चे थे।


एक बूढ़ा नग्न आदमी,

साथ में दो बच्चे थे ।


वह बूढ़ा अपने नग्न पॉव चला रहा था,

साथ ही फटे कपड़ों को भी छुपा रहा था ।


लोग उसे देखते और स्थिति पर विचार करते,

उसे कुछ देखकर ना उसकी स्थिति पर सुधार करते।


वह थका, पर रुका नहीं,

क्योंकि उसके लिए किसी के भीतर दया नहीं ।


तमाशा कुछ इस कदर आगे बढ़ा जा रहा था,

वह बूढ़ा अपने अग्नि पथ पर चला जा रहा था ।।


                          प्रीति सिंह