नसीहत नसीहत मेरी इतनी है, कि पहले नीयत हम अपनी साफ करें ,
छोटे, नग्न कपड़ों को कोसने से पहले, नजरों की गंदगी को खाक करें |
कब तक दोष देते रहेंगे, चाल और चलन का,
क्या कमी नहीं हैं, हममें नीति और धर्म का |
मत भूलों की चार साल की बच्ची का कोई दोष नहीं हो सकता, क्योंकि उसे अपने कपड़ों का कोई होश नहीं हो सकता |
क्या सलाह देंगे हम उस दस साल की बच्ची को,
की भूल जाओ बचपना और स्मरण रखो, की तुम एक लड़की को।
तुम यहाँ-वहाँ, रात-दोपहर, आ-जा नहीं सकती हों,
क्योंकि भेड़ियों के शहर में तुम मिमियाती सी बकरी हों।
नोच, खसोट, अपहरण वो जो चाहे कर सकते हैं,
अन्याय के खिलाफ यदि आवाज उठाई तो जान भी वो ले सकते हैं
।
यह समाज बुरा नहीं, पर नियम इसके कुछ निराले हैं,
पग,पग पैरों में बंधन भी इसी समाज ने डालें हैं |
तुम इस सभ्य समाज में किस तरह जी पाओगी,
क्योंकि हर हालात में तुम खुद ही दोषी बन जाओगी |
अब तुम स्वय हीं अपनी स्थिति पर विचार करो,
पुत्री, बहन, माँ सब बनो, पर खुद के भीतर दुर्गा का अवतार धरो।
तुम कुछ ऐसी एक मिसाल बनो,
ना हो प्रताड़ित तुम, और औरों की भी ढ़ाल बनो ||


