पुरुष को है ये अभिमान,
स्त्री ना है उसके समान,
समझ कर अपने अधीन,
करता हर पल उसका अपमान,
और कहता मैं हूँ बलवान |
पर तुम ही बताओ,
मुझमें ही पल कर ,
कैसे बन बैठा तू मुझसे बलवान |
ना तुझसे उत्पन्न, ना तुम में विलीन,
ना तुझमें स्वतंत्र, ना मैं तेरे अधीन,
आत्मनिर्भर व्यक्तित्व मेरा,
पर तू हुआ था मेरे अधीन।
महसूस कर तेरे कदमों की आहट,
थाप ली अपने गर्भ में तेरी मान,
तुझे जन्म देने में टूटी मेरी हड्डियाँ लकड़ियों के समान,
तेरे रोने पर हर बार निकली मेरी जान,
मुझमें ही पल कर ,
कैसे बन बैठा तू मुझसे बलवान |
तुझे बनाया, तुझे सवारा,
जब-जब भी तू गिरा, तुझे संभाला,
कल तू था निर्बल, मैं थी बलवान,
कराया तुझे अपने स्तनों का पान,
मेरा ही दूध पीकर, तू खड़ा हुआ सीना तान,
मुझमें ही पल कर कैसे बन बैठा तू मुझसे बलवान |
धारण किया गर्भ में तुझे,
खून से सिची तेरी जान,
मथ कर मेरे जीवन को,
जो खड़ा हुआ है तू बलवान,
अब तू ही बता,
मुझमें ही पल कर कैसे बन बैठा तू मुझसे बलवान ||


