थी स्वतन्त्रता कभी हमें भी,
अपना वर चुनने की,
शिक्षा पर भी अधिकार था हमारा,
घूँघट के बंधनों में नहीं बंधें थे हम,
वेद और ज्ञान से भी सरोकार था हमारा,
स्त्री थी पुरुष का आधा भाग,
अर्द्धांगिनी सा स्वरूप था हमारा,
सबल क़दम को धर धरा पर,
धीरे – धीरे हम चल तो रहे थे |
बदलाव समय की नीति है,
स्त्री का हनन इस बदलते समाज की रीति है |
छीने सारे अधिकार हमारे,
विपदावों ने समक्ष डेरे डाले,
शिक्षा से कुछ इस कदर दूर हुए,
घर में बंध रहने को मजबूर हुए,
सज़ावट के वस्तु के थे हम समान,
रूपय तय करके दिया गया हमारा दान,
विपरीत परिस्थितियों से हम लड़ तो रहे है,
धीरे-धीरे ही सही हम चल तो रहे है |
बढ़ते क़दमों को हमारे,
कुछ इस कदर रोका गया,
अकेला देख हमें हर बार टोका गया,
वीरान रास्तों को दिखा कर डराया गया,
चुप हो जाओ ये ही हर बार सिखाया गया,
मान कर लोगों की बात,कुछ ने सर झुकाया,
कुछ ने स्पस्ट शब्दों में ना कर,इंकार दिखाया,
किसी ने हार मानी, किसी ने बात,
किसी ने उठाई, अन्याय के खिलाफ आवाज
बुलंद सोच लिए, हम आगे बढ़ तो रहे है,
धीरे-धीरे ही सही हम चल तो रहे है |
नहीं है अब भी कुछ ज्यादा सुधार ,
बिगड़े से ही है हमारे हालात,
हम सुनसान राहों पर आज भी निकलने से डरते है, क्योंकि कुछ लोग जानवरों का नहीं,
औरतोंका शिकार करते है,
शिक्षा ली, पद लिया, आत्मनिर्भर बनकर दिखाया,
पर आज भी हमारा समाज पुरुष प्रधान ही कहलाया,
यह व्यथा नहीं मेरी, और ना ही स्त्री गाथा है,
क्योंकि औरतों का दुख यहाँ कहा किसी को समझ आता है,
मान और सम्मान कि लड़ाई आज भी हम लड़ तो रहे है, धीरे-धीरे ही सही हम चल तो रहे है ||


