मेरा इश्क़ बे-अल्फ़ाज़ था, उसके अल्फ़ाजों में था इश्क़,

वो मुझसे मिलकर कहता था, तू मुझसे प्यार करना सीख |


हम रोज-रोज मिलते, और वो इज़हार करता था,

अपनेअल्फ़ाजों को तौल, मोहब्बत बे-शुमार करता था |


मैं शब्दहीन, बे-अल्फ़ाज़, उसे सुन लिया करती थी, मोहब्बत अल्फ़ाजों की चीज़ नहीं, मन ही मन ये बुन लिया करती थी |



मोहब्बत को अल्फ़ाजों में समेट, वह मुझसे इश्क़ करता था।

और मैं खामोश होकर भी उसी पर जान देती थी |


फर्क बस इतना था हम दोनों के बीच,  

   

वो जो व्यक्त कर पाता, उसे हीं इश्क़ समझ बैठा,

और मैं अनकहे एहसासों को प्यार कहती थी ||   


प्रीति सिंह