'मैं'

नहीं जानता

कि तुमसे

दोस्ती है या प्रेम।


'मैं' 

नहीं जानता

दोस्ती या प्रेम

निभाते कैसे हैं।


'मैं'

नहीं जानता

दोस्त और प्रेमिका

की अहमियत क्या होती है।


हाँ'

मैं इतना जनता

हूँ कि तुम्हारी

इक मुस्कान की खातिर

हँसते–हँसते जाँ कुर्बान

कर सकता हूँ।


–✍️प्रवीण कुमार शुक्ला