#तुम्हारी_याद को,

दिल से,

लगाए बैठे थे।

पतझड़ के मौसम में,

बसंत की उम्मीद,

लगाए बैठे थे।

दिल के अरमानों को,

ख्वाबों में,

सजाए बैठे थे।

दिन-रात,

विरह से सताए,

पीड़ित बैठे थे।

तभी डाकिया,

कागज का टुकड़ा लाया।

हम रात भर उसे,

सीने से लगाए बैठे थे।


@PoojaAuthor / पूजा इन्दोरिया शर्मा