कुछ फूल, कुछ कलियां
महके गुलशन, माली की बगिया।
ना जाने कितनी बार,
खून पसीने से उसने सींचा।
अनजान एक आवारा टिड्डा,
उड़कर आया, खा डाली कलियां।
उजड़ा चमन, माली ने खुद को ही कोसा।
अब प्रेमी भवरा नहीं होता पैदा,
ये गुजरे जमाने की बात है भैया।
@PoojaAuthor / पूजा इन्दोरिया शर्मा


