पंक में भी खिलती, कली कमल की
इन कलियों को भी, खिल जाने दो।
बिन कली और प्रकृति, है नाश तेरा भी
पौरुष जगा, प्रेम से सींच इसकी जड़ को।
कायर, भीर पुरुष तू, बिखरी दरिंदगी
कहीं तो होगी, कोई वजह जो।
Pooja Indoria Sharma
@PoojaAuthor


पंक में भी खिलती, कली कमल की
इन कलियों को भी, खिल जाने दो।
बिन कली और प्रकृति, है नाश तेरा भी
पौरुष जगा, प्रेम से सींच इसकी जड़ को।
कायर, भीर पुरुष तू, बिखरी दरिंदगी
कहीं तो होगी, कोई वजह जो।
Pooja Indoria Sharma
@PoojaAuthor