
पंक में भी खिलती, कली कमल की
इन कलियों को भी, खिल जाने दो।
बिन कली और प्रकृति, है नाश तेरा भी
पौरुष जगा, प्रेम से सींच इस
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पंक में भी खिलती, कली कमल की
इन कलियों को भी, खिल जाने दो।
बिन कली और प्रकृति, है नाश तेरा भी
पौरुष जगा, प्रेम से सींच इस