आग सी प्रचंड, शबनम सी मनभावनी भी हूं।नीर सी पावन, कामायनी भी हूं।लता सी कोमल, घाटी की गहराई भी हूं।कमल किशोरी, वन की पर्णीका भी हूं।पर्वत सी कठोर, ममता का सागर भी हूं।शारदे की वाणी, अर्धांगिनी रूप भी हूं।
आग सी प्रचंड, शबनम सी मनभावनी भी हूं।नीर सी पावन, कामायनी भी हूं।
लता सी कोमल, घाटी की गहराई भी हूं।कमल किशोरी, वन की पर्णीका भी हूं।
पर्वत सी कठोर, ममता का सागर भी हूं।शारदे की वाणी, अर्धांगिनी रूप भी हूं।