जिजीविषा से साक्षात्कार करना हो तो चले आइए हमारे बिहार में अभी इस बारिश के मौसम में आशावादिता का जीवंत स्वरूप किसान के रुप में खेतों में दिख जाएगा।ना कोरोना का कहर ना मंदी की मार सबसे बेखबर और अंजान पारंपरिक गीतों के धुन पर उम्मीदों को बोये जा रहे हैं।आशा,विश्वास और प्रसन्नता का संगम को उनके चेहरे पर देखकर अन्नदाता शब्द का सार्थक अर्थ आज समझ में आ रहा था।यही सब सोचते हुए खेत की मेड़ पर मैं चला जा रहा था

अचानक कीचड़ में पैर फिसला और मैं पानी के अंदर।तभी एक आवाज कान में गूँजा- *बबुआ इ पटना के जीटी रोड ना ह इ गाँव के माटी ह एमे जतने सट के रहब ओतने सटा के रखी* ये आवाज बगल के खेत में काम कर रहे किसान चाचा का था जो मेरे शहरीपन पर व्यंग्य मारकर अपने काम में व्यस्त थे।मैं उठा और मिट्टी साफ करने लगा।अब इस मिट्टी में पहले की तरह बदबू नहीं आ रही थी बल्कि इसमें परंपरा की सोंधी सुगंध आ रही थी जिसे हम शहरी बनने के होड़ में खोते जा रहें हैं।

अगर आप गाँव में हो तो एक बार उस संघर्ष को जाकर देखिए जो खेतों में दिन रात हो रहा है यकिन मानिए इसके बाद आपको कभी किसी मोटिवेशनल स्पीकर को सुनने की जरूरत नहीं पड़ेगा।