आजा बैठ लें थोड़ा पास में फ़िर से ,

बरसों में मिले हैं कुछ पल फुर्सत के,


एक चाह सी दबी थी ,

      काम के बोझ तले ।

रहूँ  संग में  तेरे,

    दिन भर के लिए मैं ।

संभाले हो सारे घर को ,

     अकेले काँधो पे ।

चलो साथ में मिलकर,

      थोड़ा हाथ बटा लें।



आजा बैठ लें थोड़ा पास में फ़िर से ,

बरसों में मिले हैं कुछ पल फुर्सत के ,


आना थोड़ी देर मे खिड़की पे,

     सुबह से कह दे।

रोक लें नीदों को इन पलकों पे ,

      थोड़ी देर तलक ।

रोज़ के कामों को चलो ,

आज हम छुट्टी दे दें ।

थोड़ा अलसाया हुआ वक़्त ,

      बिता लें मिल के।


आजा बैठ लें थोड़ा पास में फ़िर से ,

बरसों में मिले हैं कुछ पल फुर्सत के ,


ना था मालूम ये वक्त ,

यू ठहर जाएगा।

दिनो का रख रखाव,

यू बिखर जाएगा।

समय जो हमेशा से,

     भागा फिरता था ।

रह गया है अब सिमट के ,

       मेरे हाथों में ।


आजा बैठ लें थोड़ा पास में फ़िर से ,

बरसों में मिले हैं कुछ पल फुर्सत के 


लौट के आयी हैं रौनक ,

घरों में अब फ़िर से ।

जब से थामा है रिश्तों ने ,

        हाथ एक दूजे का ।

खो गई थी जो जीवन की,

          भागा दौड़ी में,

वो   शरारते    अदावटें ,

     अब लौट आयी हैं ।


आजा बैठ लें थोड़ा पास में फ़िर से,

 बरसों में मिले हैं कुछ पल फुर्सत के 


आजा बैठ लें थोड़ा पास में फ़िर से ,

बरसों में मिले हैं कुछ पल फुर्सत के