ए फिक्र तू मेरे साथ साथ क्यूँ चलती है ।

क्यूँ बार बार मेरी परेशानीयों पे हँसती है


ए फिक्र,,,,,,,,,,,

क्यूँ बार,,,,,,,,,,


ना तो तू गैर है ना पक्की सहेली मेरी,

फिर क्यूँ ये नाता मुझ से निभाए रहती है


ए फिक्र,,,,,,,, 

क्यूँ बार,,,,,,,, 


सोचा है कई बार तूझे कहीं दूर छोड़ आऊँ,

ये जान के तू कुछ पल कहीं छुप जाती है


ए फिक्र,,,,,,,,,

क्यूँ बार,,,,,,,,,


कभी हों अकेले या भीड़ में हम,

साथ दामन पकड़ के रहती है ।


ए फिक्र,,,,,,,,,

क्यूँ बार,,,,,,,,,


कभी लगता है हमसफर तू उनकी,

प्यार अपनो से बेतहाशा जो किया करते हैं


ए फिक्र,,,,,,,,,

क्यूँ बार,,,,,,,,,


प्यार करती हूँ जिनको तू उनसे भी ये कह दे,

खरी  उतरुँगी ज़रा मुझको  तुम भी  आज़मा लेते ।ए फिक्र,,,,,,,,,

क्यूँ बार,,,,,,,,,