मुकम्मल हो तुम , और क्या चाहिए?
बड़े ज़हनसीब हो, और क्या चाहिए?
रख तौल पर ईमान को, देख
किस हिसाब से इस जमीं को वफ़ा चाहिए
बड़ी किल्लत है शहर में मालियों की
इस मिट्टी को मुनासिब गुलज़ार चाहिए
आज घर उनका जला है, कल तुम्हारा हिसाब होगा
ये तो कुदरती खाता है
फर्क नहीं पड़ता , तुम्हे क्या चाहिए उन्हें क्या चाहिए
खिलाफत बहुत हो चुकी, इंसानियत से
अब इबादत करो
वतन को तस्वीर में, नई रवानी, जिंदगानी चाहिए
Mukku


