मन द्रवित है मौन हूँ 

फिर भी ह्रदय यह बोलता है

रक्त रंजित इन पगों से

महीमण्डल डोलता है

इस व्यथा इस वेदना को 

देखकर भी मूक हैं जो

क्यों न उनका रक्त 

आंशिक रूप से भी खौलता है

मूढ हैं जो आज फिर से उनको

मैं चेतावनी दूं

ध्यान से सुन लो ऐ 'दिल्ली'

भूकम्प साधारण नहीं है

वस्तुत: ये शेष का फन आज फिर से डोलता है