बेसबब नाराज़ हो जाती हो
क्या लुत्फ़ मिलता है
तुम्हे फूल के माफिक रखा है
फिर क्यों काटें फैला देती हो ज़िन्दगी में
ऐसा क्या है नाराज़गी में के , उसे रोज़ पहन लेती हो
यह पैरहन दर्द देगी , यह जानती हो तुम
तोहमतें लाज़िम है हर रिश्ते में
इन्हे क्यों गले का हार बना लेती हो तुम
क्या लुत्फ़ मिलता है , जो बेसबब नाराज़ रहती हो तुम
