सुबह का सफर..


वो रोज़ मिलती है मुझे,घूमते,सवेरे,सवेरे,

खुद ही हो लेती है,अंकलजी कह,साथ मेरे,


में एक मूक श्रोता,सुनता जाता,उसकी, ज़माने की बाते,

मेरी हाँ, हूँ को भी नहीं रुकती,कह जाती,कुछ,वैसी बातें,


खुद ही करती समाधान,मिले उत्तर उसे जैसे अनायास,

तब देखती मुझे,चाहती मुझसे, मूक,समर्थन,बिना बात,


कभी उसका कुछ समझ आता मुझे,तो वो,

मेरे फलसफे,उद्धरणों से,यूँ, झुंझला जाती,


खत्म,हो जाती,बातें सभी,गहन,वो मौन,हो,जाती,

जाने क्या वो,सोचती,फिर,भी साथ,चलती जाती,


~जयेश वर्मा