कभी ऐसा होता...


कभी ऐसा होता,सुर्ख रगों की, 

माँ के उस,आंचल की, पोटली बनाऊ,

संजो रखा जिसे,अब भी,

अब तक जो देखता आया सपनें,

पूरे, अधूरे, खिलोनों से टूटे, बिखरे,

बचपन,जवानी,से अभी तक,

मन में सँजोये,वो चेहरे,

जिनकी यादों भर,से,

स्पर्शो के लिये,

तरसते अब भी 

इस मन को लिये,

दूर कहीं, चलता जाऊँ,

जहां मिलें मुझसे, वो सब प्यारे,

जो मुझे मेरी, पोटली को देख,

चिल्लाते दौड़े,जैसे बहुत दिनों के, 

बिछड़े को देखा हो,वो सब मुझे भरलें 

अपनी बाहों में,लडलें आपस में, 

पहले में, पहले में,

फिर अपने आँचल की 

पोटली पहचान, माँ आ जाये,

कहे कुछ नहीँ,

बस सर पर हाथ फेर मुस्कुरा दे,

वैसे ही जब, वो रोज़ यही करती थी,

रोज़,जीवित,घर लौटने पर साथ मेरे..

कभी ऐसा होता,साथ मेरे..


~जयेश वर्मा