हम लोग..
उन फिज़ाओं गुलाबों की करते करते याद,हम,
कांटो का था,वो कैसा हिसाब,सब भूल गए हम,
एक अगन लगी दिलो में,आंखों से थे,शोले बरसते,
कहाँ गये,वो मुस्काते चेहरे, अब मौन से,थे सन्नाटे,
कह ना पाये जो,दास्तां,उनसे,ये मलाल,आँखो को रहा,
अश्क बह गए,सो गया,वक़्त,ही,अब,याद,कुछ,ना,रहा,
अज़नबी हमसफ़र देख कर रो दिया,
एक चेहरा फिज़ाओं में गुम हो गया,
लगने लगा था वो,मुझे, अज़ीज़ सा,
हवा का झोंका था,मुझे अच्छा लगा,
रोज़,बादल,पानी,हवा,मौसम का मिजाज,
अब हमारी उम्र के,लोग करते हैं यही बात,
हम जानते,सब,ज़माने से,नही करते अब शिकवे,
मुनासिब है यही,हवा,मौसम, चुप सा,हमारे लिए,
जब तक रहता हमारे बीच मौसम खुश गवार,सा,ये,
बहुत सी खामोशियों के मायने तो,पता ही नहीँ चलते,
आज देखा उन्हें चल रहे थे उदास खरामा खरामा,
मौसम का मिजाज था,वजह,जाने क्या ख्याल था,
~जयेश वर्मा

