एक मत..
आप भी यहीं में भी यहीं,
बहुत कुछ घट रहा,यहाँ,
घरोँ से देखते हम,सभी,
दृश्य सूंदर लगे सबको,
कुछ खटकते मन में कभी,
इस चेहरों की किताब में,
कई पन्ने चेहरे,
चिपके कुछ अभी,
कुछ, नमस्ते कर मिले,
अब पीठ किये सभी,
तेरी सोच,मेरी सोच,
सोच का अंतर, ही सही,
तेरी बात, मेरी बात,,
बातों में बहस ही सही,
सोच का अंतर,
बहस का मुद्दा,
सही हो, ना सही,
इतना तो कीजे जनाब,
कहें अपनी,
मेरी सही हो ना सही,
विचारधाराओं के झंडों से परे,
एक,जहां औऱ भी है,
इंसानियत का,
जहां रहते सभी हैं, एकमत..
मानते यही ..हैं..
रँगे रहो मन,रंगरेज़ ले जेहैं,
अब्बई कह लेव,सुन लेव,सब,
कोनों को भरोसों नईये...
~जयेश वर्मा
