ये कैसी जवानी आयी है, बचपन का ज़माना छूट गया
बरगद के वो झूले छूट गए झरने में नहाना छूट गया
वो दौड़ के चढ़ जाना पहाड़, चट्टान पे जाकर सो जाना
दुनिया की झंझट से बेसुध अपनी ही धुन में खो जाना
अब तो तालाब में पत्थर को गोते खिलवाना छूट गया
बरगद के वो झूले……….
वो बाग में जाकर चुपके से कुछ आम तोड़ कर ले आना
चूल्हे की गरम गरम रोटी मक्खन से लगाकर के खाना
अब छुप छुप करके चम्मच भर के शक्कर खाना छूट गया
बरगद के वो झूले……….
सर्दी में सूरज ढलते ही छुपकर राजाई में सो जाना
गर्मी की रातों में छत पर तारे गिनने में खो जाना
बारिश के पानी में कागज की नाव बहाना छूट गया
बरगद के वो झूले……….


