अंदर से ख़ाली और खोखले लोग, 

बाहर से भरे हुए होते हैं,

अभिमान से, ईर्ष्या से, दंभ से, ज्ञान के भ्रम से,

औरों के जीवन को ताश के पत्तों सा समझने वाले ये लोग,

अपने पैरों तले कुचल देतें हैं, रौंद देते हैं, औरों के स्वाभिमान को,

औरों की मेहनत को अपनी धारणाओं के कठगरे में तोलने वाले ये,

खुद को अधिकारी समझते हैं, चुनने का, कौन लायक़ है, कौन नहीं,

सिर्फ़ अपने आप में उलझे ये आधे-अधूरे, लोग,

कभी नहीं देख पाते अपनी मान्यताओं के उस पार,

उस जगह को, जो जगह, सिखाती है,

इज्जत, प्रेम और विनम्रता,

वे कभी नहीं जान पाते, 

की अज्ञानता, ज्ञान का अभाव नहीं है,

ज्ञान का अहंभाव है,

और सफलता या शोहरत आख़िरी सत्य नहीं है,

मृत्यु, आख़िरी सत्य है,

और जब सब नश्वर है, नाशवंत है, अंत के अधीन है,

तो किस बात का घमंड और किस बात की अकड़,

अंत में, तुम्हारा पाया हुआ सब शून्य है और तुम्हारा खोया हुआ भी सब शून्य है,

और, अगर अंत शून्य है,

तो शून्य के लिए इतना सब क्यों?