बची हुई बातें,
अक्सर बच नहीं पाती,
समय के गले में फ़सकर,
वे दम तोड़ देतीं हैं, या फिर,
मन के किसी अंदरूनी कोने में घुटकर,
वे हमेशा के लिए चुप हो जाती हैं,
या फिर जीजक और उपेक्षाओं के पैरों तले आकर,
वे कुचल दी जाती हैं,
वो बचपन की सहेली जो,
गाँव छोड़ने से पहले कुछ कहना चाहती थी,
वो माँ जो बेटे को पढ़ने दूर भेजती है,
वो जानती है कि एक दिन, दूरी सिर्फ़ शहरों की नहीं रहेगी,
वो पिता, जो बेटी से खुल के कहना चाहता था,
जा तू ऊड़ जा, समाज को मैं देख लूँगा,
वो लड़की जो आकाश को तकती रहती थी,
इस आस में की तारा टूटे, तो मांगे, आत्मसम्मान का प्रकाश,
वो लड़का जो बनना चाहता था बहुत कुछ,
पर घर की छत बनाने में उलझ चुका है,
वो बच्चा जो केक का टुकड़ा बस देख पाया, ख़रीद नहीं,
ये सोच की जब बाबा के पास बहुत पैसे होंगे तब ख़रीदेंगे,
वो प्रेमिका जो प्रेम कर पायी, कह नहीं,
ये मानकर की प्रेमी को तो पता ही होगा,
वो प्रेमी जिसने दिल दुखाया, प्रेम के नाम पर,
ये सोचकर की ये भी तो औरों जैसी है, भूल जाएगी,
वो दोस्त जिसको तुमने अपनी अना के चलते जाने दिया,
ये सोच की मैं क्यों पहले बात करूँ,
वो सहकर्मी जिसको तुमने अपने से कमतर समझा,
क्योंकि तुम्हारी कमतरी दिख ना जाए,
वो बातें जो होठों के किनारे पर आके रोक दी गई,
वो बातें जो चीखती हुई, चुप हो गई,
जाने ऐसी कितनी ही बातें जो बचाई जा सकती थी,
बस एक पहल से,
वो तुमने बचाई नहीं, कोशिश तक नहीं की,
और उन बातों के साथ चला गया समय का वो हिस्सा,
जहां तुमने संभावनाओं के बीज रखे थे,
वो बीज जो शायद आज, प्रेम का पेड़ बन,
जीवन की धूप में तुम्हारी रक्षा करता,
पर तुमने जीवन की धूप चुनी,
तुमने मौन चुना,
और मौन के साथ तुमने चुने फ़ासलें,
फ़ासलें, जो भरे नहीं कभी,
और दुखते रहें,
मन के उस कोने में,
जहा, बची हुई बातें अब भी,
बची हुई थी…!!
-हिना अग्रवाल
