शरीर के, कोनसें कोने से निकलता है जीव,
कोनसें आकाश को चीरकर, आत्मा अनंत की यात्रा को निकलती है,
पंचमहाभूत में विलीन हो ही जाता है देह, क्या प्रमाण है,
अग्नि में जलतें हुए, स्मृतियों के कण कदाचित् बचे रहे, क्या पता,
अंतिम घड़ीं में, तुलसीपत्र मुँह में रखने से, क्या यम कम सतातें हैं,
पर यम के आने से पहले, अगर, अपनों से विरह की पीड़ा दुःख रही हो फिर क्या,
स्वर्ग का रास्ता है कहीं, अगर है तो दुनिया के कौन से शहर से होकर गुजरता है,
और नर्क का अस्तित्व, पृथ्वी के आसपास है या दूर कहीं,
वो कौन सी नदी है, जिसको पार कर,
आत्माएँ दूसरे जन्म के दरवाज़े को खोलतीं हैं,
और जो दरवाज़ें खोल नहीं पातीं,
वो क्या, सच में भटकती रहतीं हैं,
मोक्ष तक पहुँच गया है कोई, कैसे जान पातें हैं ,
श्राद्ध के तर्पण से, हमारे पूर्वज तर्पित हुए ही, कैसे पता चलेगा,
पुण्य और पाप का बहिखाता, कहीं लिखा गया है क्या,
और जो बहिखाते के नियमों में नहीं आ पाएगा, वो कहाँ लिखा जाएगा,
ये कैसे हो सकता है की मरने के बाद,
अपनों से मिल पाने को सारे रास्ते बंध हो जातें हैं,
जिनसे तुमने जीवनभर प्रेम किया,
उनसे बिछड़कर, बस बिछड़ ही जाओगे, कैसे हो सकता है,
कैसे सारा अनुराग और स्मृतियाँ, शून्य हो सकती हैं,
कैसे जो जिया गया, वो जीवन रिक्त हो सकता है,
मैं, ऐसे नहीं मर सकती,
मुझे जानना है कि, मृत्यु के बाद आत्मा जाती कहाँ है,
मुझे जानना है कि, मुझे छोड़कर जानेवाले मेरे लोग कहाँ हैं,
मुझे जानना है कि, वे मुझें कब और कैसे मिलेंगे,
मैं, अधूरी चीज़ें अधूरी नहीं छोड़ सकती,
मैं, मृत्यु के नियमों को मान नहीं सकती,
मुझे मुक्ति की कोई चाह नहीं,
मैं बंधनों से बंधकर भी, छूट सकती हूँ,
इसीलिए, रिक्तता, शून्यता और मृत्यु के परे जो कोई भी है, उसका जो भी नाम है,
मृत्यु के पश्चात,
मुझे उससे जवाब चाहिए,
जवाब के साथ साथ हिसाब चाहिए,
जीवनभर के,
मेरे सबंधों का,
मेरी स्मृतियों का,
और मेरे प्रेम का….!!
