“खोने की प्रक्रिया”
मैंने, हर संबंध को, आख़िरी क्षण तक बचाने की कोशिश की,
छोटे-बड़े हर इंसान को अंत तक कहाँ की हम समाधान कर सकते हैं,
मेरा स्वाभिमान ताक पर रखते हुए मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की,
अपने आप को पीछे रखते हुए, मैंने उन सब को आगे रखा,
अपमान, अन्याय और तिरस्कार को अनदेखा किया,
अपनी गरिमा और अखंडता को औरों के अहंकार के पैरों में रख दिया,
पर समय के साथ, मैंने जाना की,
खोने की प्रकिया दो लोगों के बीच होती है,
जहां दो लोगों को लगता है,
की संबंध टूट गया
या कुछ पीछे छूट गया,
जिसमें दोनों आहत हों,
जिसमें दोनों के मन को, पीड़ा कचोटें,
जिसमें दोनों को दिन, दिन ना लगे,
जहां दोनों को रात कोई घात सी लगे,
जिसमें दोनों के हृदय में एक कौना बचा रहे,
जो दूसरे के नाम को याद रखे हुए हो,
जिसमें दोनों की यादें हों,
बातें हो, कहानियाँ हों,
जिस संबंध में,
सिर्फ़ एक व्यक्ति को खोने का भास हो,
एक ही व्यक्ति अकेला रह जाएँ,
वो संबंध, संबंध नहीं,
संबंध के नाम पर मखौल है,
और कोई आपको प्रेम करे या ना करे,
कोई आपको पसंद करे या ना करे,
पर आपकी पसंद और प्रेम का मखौल बनाने का हक़,
किसीको भी नहीं है,
तो,बात ये है,
जो रुकना नहीं चाहता,
उसे रोका नहीं जा सकता,
जो चाहा जाना नहीं चाहता,
उसे चाहा नहीं जा सकता,
जो बचना ना चाहता हो,
उसे बचाया नहीं जा सकता,
जो अपना सब लुटाना ना चाहता हो,
उसपे अपना सब लुटायाँ नहीं जा सकता,
क्योंकि, किसी भी संबंध में,
प्रथम और अंतिम आवश्क्यता है,
दो लोग,
दो लोगों का होना,
दो लोगों का मिलना,
और दो लोगों का बिछड़ जाना…!!!
-हिना अग्रवाल
