माँ, एक दिन, तुम भूल जाओ की तुम माँ हो,
माँ एक दिन, तुम भूल जाओ की तुम बीवी हो, बेटी हो, बहन हो, और जाने क्या क्या हो,
एक दिन, तुम भूल जाओ की बाबा को ऑफिस जाना है और टिफ़िन नहीं बना,
एक दिन, तुम भूल जाओ की भैया की क़मीज़ का बटन टूट गया है,
एक दिन, तुम भूल जाओ की मेरी परीक्षाओं के दिन क़रीब है और तुम्हें मुझे पढ़ाना है,
एक दिन, तुम भूल जाओ की बिजली का बिल भरने का आज आख़िरी दिन है,
एक दिन, भूल जाओ की दादी की दवाईं आज ख़त्म हो गई,
और दादा के कुर्ते को आज प्रेस करना है,
एक दिन, भूल जाओ की त्योहार आ रहे हैं तो मिष्ठान बनाने हैं,
और बचाए हुए पैसों से घर की मरम्मत करानी है,
एक दिन, भूल जाओ की वजन घटाना है और कम खाना है,
एक दिन, भूल जाओ की घर में कितने काम पड़े है, पिक्चर देखने नहीं जा सकते,
एक दिन, तुम भूल जाओ की तुम्हारा बाया कंधा जो दुखता है वो ऐसे ही ठीक हो जाएगा,
क्योंकि नहीं होगा,
एक दिन, भूल जाओ की तुम स्लीवलेस ब्लाउज पहनने से बुरी औरत हो जाओगी,
एक दिन, भूल जाओ की थोड़ा नाच लोगी तो शर्मिंदा हो जाओगी,
एक दिन, तुम भूल जाओ की तुम बहु हो और तुम्हें दायरे में रहना है,
एक दिन, तुम भूल जाओ की सिर्फ़ औरत की ज़िम्मेदारी है घर की इज्जत बचाने की,
एक दिन, भूल जाओ की मन का करना स्वार्थ है,
एक दिन, भूल जाओ की अपनी ख़ुशी को पति-बच्चों की ख़ुशी से ऊपर चुनना पाप है,
एक दिन, तुम सब भूल जाओ,
सब कुछ,
एक दिन, हवा हो जाओ,
उड़ो, नाचो, गाओ, झूमो, गुनगुनाओ,
एक दिन, बस अपने बारे में सोचो,
सिर्फ़ अपना सुख सोचो, अपना दुःख सोचो,
अपनी अधूरी इच्छाओं का पिटारा खोलो,
और संतोष के सिक्के चुरा लो,
एक दिन, वो करो और वो कहो,
जो तुमने दिल की परतों के नीचे दबाकर रखा है,
एक दिन वो हो जाओ,
जो तुम्हारी आँखो में बसी हुई, 16 साल की लड़की होना चाहती है,
किसी भी रिश्ते और नाम के बिना,
एक दिन,
बस एक दिन,
तुम, तुम हो जाओ…!!
-हिना अग्रवाल
