मध्यम वर्ग के लड़कों को,

लड़का होने से बहुत पहले बनना पड़ता है,

बाप का कंधा,

माँ की उम्मीद,

बहन का रक्षक,

भाई का दोस्त,

उनका बचपन सपनों की गोद में बीतता है,

सपनें, जिनको पूरा करने में ,

जाने कितनी इच्छाएँ मारनी पड़ती हैं,

उनकी जवानी, बीत जाती है,

भविष्य के महल की दीवारों को चुनने में,

और जब महल बन जाता है,

वो महल की मरम्मत में जीवन बिता देतें हैं,

ताकि उनके बच्चों को बना बनाया महल मिले,

जो उन्हें नहीं मिला,

प्रेमिका की आँखों में डूबने की उम्र में,

वो किताबों के पन्ने में डूब जातें हैं,

सफलता और असफलता के तराज़ू में ख़ुद को तोलते हुए,

वे, नौकरी के लिए धक्के खातें हैं,

अपनी अपेक्षाओं और शोख़ से पहले,

वे सोचते हैं घर में टीवी और फ्रीज़ बसाने का,

दिवाली में फटा हुआ जूता सिलकर चलानेवाले,

छोटे बहन और भाइयों के लिए,

सारा बाज़ार ख़रीद लातें हैं,

कुछ, परदेश में पैसा कमाने को जातें हैं,

फिर, वे, कभी लौट नहीं पातें हैं,

घर से, हज़ारों मील दूर रहते हुए,

वो परिवार की ज़रूरतों को सबसे आगे रखतें हैं,

कभी अगर अपने लिए सोच लेतें हैं,

तो अपराधबोध के तले दब जातें हैं,

औरतें दुःख में रो लेती हैं, अच्छा है,

पर पुरुष रोए, दिल फाड़कर,

हम देखतें नहीं,

सारे सवाल, जवाब, शोक, अवसाद, दुःख,

आँखो के कोनों में छुपा लेते हैं वे,

घर की जवाबदेही में अपना सर्वस्व लुटाने वाले वे,

कभी नहीं माँगते, अपने हिस्से का सुख,

और इसीलिए, अगली बार,

आपके आपस कोई बेटा, बाप, भाई या कोई और पुरुष,

सबको सूख देता हुआ दिखे,

तो उसका हाथ थामिए,

उसको पूछिए वो कैसा है,

कहीं उसको कोई तकलीफ़ तो नहीं,

क्या कोई ऐसा सपना है उसका जो पूरा नहीं हुआ,

क्या कोई प्रेमिका थी उसकी,

जिससे वो फिर कभी मिल नहीं पाया,

उसके दिल की उन परतों को खोलिए,

जहां उन्होंने अपने दुःख छुपाकर रखे हैं,

उसके सर पर हाथ रखिए,

और उसे बोलने दीजिए,

क्योंकि,

दुख, पीड़ा, सुख, भाव, अभाव, उत्साह, उद्वेग और आंसू,

दिखाने का अधिकार,

पुरुषों को भी है…!!!


-हिना अग्रवाल