जब मेरी आँखों में खून उतर आए,

मेरी छाती की सारी नसें फटने लगे,

मैं खडी खडी ढेर हो जाऊ,

और मेरी आत्मा, मेरे शरीर से रिसने लगे,

तब समज लेना,

अब में प्रेम में नही,

अब में घृणा में नही,

मैं जिंदा नही,

मैं मरी भी नही,

मैं वो हूँ नही, जो हुआ करती थी,

मैं वो हो नही सकती, जो होना चाहती हूँ,

पर मुझे वो होना है, जो में नही होना चाहती,

इसीलिए मैं वो नही बनूँगी, जो होना चाहती हूँ,

ये अभिशाप है,

और अभिशाप से छूटने का मार्ग भी यही है,

ये होगा, ये होना है, ये होना था,

ये नियति है,

और ये नियति द्वारा किया गया अंतिम अत्याचार है..!!!