प्रेम में पड़ी हुई स्त्री को ईश्वरत्व की प्राप्ति से ज्यादा स्त्रीत्व की प्राप्ति ज्यादा प्रिय लगती हैं. स्त्रीत्व की सीढ़ियों से होते हुए वो कब ईश्वरत्व में विलीन हो जाती है उसे पता नही चलता. प्रेम में, स्त्री, ईश्वर की हो जाती है और ईश्वर, स्त्री का हो जाता है...!!!