क्या विडंबना है, जो सही है वो गलत लगता है, और जो गलत है वो सही, शायद सबसे सही, सही से भी ज्यादा सही। हदय किसी पतंग सा हो गया है जिसको ना सही दिशा का भान है ना तो उसकी डोरी को किसी धुरी का अनुमान है। विचार जैसे कोई चक्रवात है और उन्हें चीरते हुए हिम्मत की लकड़ी बीच से टूट गई है। मेरे पास बस सींग मारते हुए सवाल हैं और कुछ नही, कितनी भी कोशिश करू, सवालों की शय्या पर टँगा हुआ मेरा मन स्वतंत्र नही होता। खुद से झगड़ना, खुद को मनाना, खुद को कोसना फिर जगड़ना, दिन और रात के आठों प्रहर बस यही चलता रहता है। कोई रात चैन और शांति की नही जाती। आँखे, नींद से युद्ध पे चढ़ी है, सपनों पर भूत के भेड़ियों ने हमला बोल दिया है। कल, किसी दरिया के बीचोबीच डूबा हुआ जहाज है जिससे निकलता हुआ तेल आज को भी प्रदूषित कर रहा है। उम्मीदें, आशाएँ और उत्साह किसी मकड़ी के जाले में उबासियां ले रहें हैं। समय का पहिया मेरे विरुद्ध में चल रहा है जहाँ से ईश्वर का घर बहोत दूर दिखाई पड़ता है। मैं अपनी ही सबसे घातक शत्रु हो गई हूँ और मैंने अपनेआप को विनाश, विध्वंश और पतन की कोठरी में कैद कर रखा है। ये मेरा, मेरे साथ का द्वंद है, यहाँ कोई भी जीते, मेरी हार निश्चित है।


