जानते हो, 

ये जन्म,

बचने, और बचाएँ जाने को पूरा नहीं पड़ा,

अब, मुझे बचाने को, 

तुम्हें आना होगा,

समय की चाक को रोक कर,

जन्मों की किवाड़ों को खोलते हुए,

मृत्यु की नदी को पार कर, 

जन्म, मृत्यु और मोक्ष की त्रिवेणी को पीछे छोड़ना होगा,

फिर, तुम उस बाग़ान में पहुँच जाओगे, 

जहाँ से फूलों के उगने का आरम्भ हुआ था,

मैं, वही मिलूँगी तुम्हें,

हसती हुई, 

बरखा और बाग़ान से बतलाती हुई,

मुरझाते फूलों को बचाती हुई,

और खुद को बचाने वाले की राह देखती हुई,

क्योंकि,

इस जगत में, मैं नहीं बचा पाई,

ना फूलों को,

ना अपने-आप को…!!!


-हिना अग्रवाल