पता है,

आकाशगंगा के सारे सुर्यमंडल, तारामंडल और आन्ध्र पदार्थो के बीचोबीच से होते हुए एक नदी बहती है। संसार के सारे प्रेमियों की अस्थियाँ उस नदी में बहाई जाती हैं। इस नदी से होते हुए ये अस्थियाँ फिर एक आकाशगंगा से दूसरी आकाशगंगा में प्रवास करती हैं। अंत में, ये अस्थियाँ उस अकाशगंगा में पहुंच जाती हैं, जहाँ से ईश्वर ने सृष्टि के निर्माण का प्रारंभ किया था। यहाँ, इन अस्थियोँ में जीव, प्रेम, पुण्य और प्रकाश डालकर इनमें से फिर किसी प्रेमी की आत्मा की रचना की जाती है। मैं और तुम अब नहीं मिले तो क्या, तब मिलेंगे, आकाशगंगा के बीचोबीच बहती हुई उस नदी के किनारे। लाखों प्रकाशवर्ष और हजारों सालों की ये यात्रा पार करने के पश्चात जब हमारी आत्माओं को फिर जीवित किया जाएगा, मैं फिर, मैं होना चुनूँगी. तुम फिर, तुम होना चुनना। हम फिर यही कहानी चुनेंगे। फिर प्रेम करेंगे, फिर बिछड़ जाएंगे, और फिर किसी अकाशगंगा के बीचोबीच बहती हुई नदी में समा जाएँगे..!!!