मेरी आंखों की आवाज को पहचानो कोई ,

मेरी चहूओर चिखती खामोशी को सुन लो कोई ,

मैं फस चुकी हूं इस दलदल में, आओ और निकालो कोई!


हरे-भरे जंगलों में इन सूखे पत्तों का हाल भी पूछो कोई,

श्मशान में घूमती है जिंदा लाशें जाके उनका पता भी पूछो कोई,

चौराहे पर बैठ के मांग रहा है बच्चा एक रुपैया,

जाके उनके चेहरे की धूल को मिटाओ कोई,

रात होने पर आंख भर आती है जिस बात बाप की जाकर उनके घर भी मुट्ठी भर दाना दे आवो कोई,


मेरी आंखों की आवाज को पहचानो कोई 


मधुशाला भरी पड़ी है जिन आशिकों से जाकर उनकी महबूब को मनाओ कोई!

कोई ले रहा है सीसकीया बिस्तर में मुंह छुपाते हुए,

जाकर उनके कंधे पर हाथ रख आवो कोई,

आश्रू से नाह रही हैं कई माताएं, जाकर उनके गांल पोंछ जाओ कोई!

लफ्ज नहीं है, बोलने को अब मेरे पास,

कलम भी थकी पड़ी है...

मेरी आंखों की आवाज को पहचानो कोई,

मेरी चहु ओर चिखति खामोशी को सुन लो कोई!!

~Drashti❤