हाथों से फिसली
कच्ची उम्र सी
अधपकी प्रीत
दे गयीं
पक्की यादें
आंखो के
बरस जाने के बाद
छा गयी
मन के आकाश पे
रंग बिरंगी यादें
इंद्रधनुष सी
पतझड़ में
पीले पत्तों से
झर रहे हैं
सूखे हुये अहसास
तेरी यादों का
ये कैसा बसंत
वो बातें
जो मैनें कही
तुमने सुनी नहीं
अब शूल सी
चुभती हैं
उनकी यादें
तेरी याद जैसे
किसी पुरानी
वीरान हवेली
की दीवारों पर
जम जाती है
हरी काई
थोड़ी सी
बारिश के बाद
मन का भंवर
हौले हौले से
सहलाता है
स्मृतियों के
पुष्प गुच्छ
और बिखर
जाती है सुगंध
मेरे आस पास
होते हो तुम
गुमशुदा अहसास
सर्द तन्हाईयां
तेरी यादों की
गर्मजोशी ओढ़कर
गुजारी है रात
अंधेरी रात को
रोशन करती
जुगनुओं सी
रात भर
टिमटिमाती रही
तुम्हारी याद
जाते हुए
तुमने कहा था
खत्म हुआ
जो कुछ भी था
तेरे मेरे बीच
फिर क्यूं जारी है
तेरी यादों के
ये सिलसिले
रो रो कर
गुजारी है रात
ओस बनकर
आसमां से
झर रही है
तेरी याद

