वो ना कोई सिकंदर हैं ना कोई कलंदर 

वो तो बस होते हैं अतरंगी से मस्त मलंग

किंचित सामर्थ्य में कितने खुश रहते हैं

अपनी जिद को हौसलों के पंख लगा लेते हैं


जो सूरज के घोड़े दौड़ा लें

जो हिमशिख को मैदान बना दें

जो नभ को सतरंगी कर दे

जो हवाओं में सुर लहरी भर दे

जो नदियों की राह मोड़ दें

जो पृथ्वी का माप नाप लें

जो संकल्पों से सिद्धि कर लें

जो अथक अग्निपथ चल लें

ऐसे अदम्य साहसी कैसे हुये

अपंग अपाहिज या विकलांग


दृढ़ स्वर से हर बाधा को जीतने निकले

ये विजयी पथिक हैं अग्नि पथ के

जाने इनके संघर्षों की अनंत कथाएं 

अनवरत जारी है जो विषम यात्राएं

आओ इनकी राह कुछ सुगम्य बनाएं

आओ इनको अपना अंतरंग सखा बनाएं