निराशा की स्याह रात

बन जाती है

सुनहरी भोर


पीड़ा के बादल में

उभर आता है

इंद्रधनुष



अवसाद की धुंध में

खिल उठता है

मुरझाया मन


भटके पंक्षी की आमद से

चहकने लगता है

उजाड़ नीड़


पतझड़ के बाद भी

लौट आता है

बीता बसंत



नीरस रिश्तों से भी

रिसने लगता है

मादक महुआ



बेरंग जीवन में

भर जाते हैं

फाग के चटख रंग


बस निभा लो वो वादे

जो किए है तुमने

प्रेम में


#वादा