अप्रतिम रूप अमावस का
अनुपम सौंदर्य
कैसा निखर आया है
विभावरी
जिसे तारों जड़ी
रजत चुनर सुहाती है
जो चन्द्रहास का रस
छलकाती है
वो लावण्या
हिरण्याक्षी
स्वर्णप्रभा अप्सरा सी
सुनहरी हुई जाती है
जिसे गहय रहा था
तिमिर
अपने आलिंगन में
वो तिमिस्री
आज दीप का
नेह निमंत्रण
स्वीकारती है
मुदित मन
हर्षित शोभित
धरा पर
स्वर्ण निश्रा सी
उतर आती है
हिरण्यमयी
विष्णुप्रिया की
सखि संगिनी बन
दिगदिगंत अनंत में
स्वर्ण कलश
रख जाती है
समृद्धि शुभता श्री की
अक्षय वृद्धि वर
वसुधा को
स्वर्ण नगरी
अयोध्या सम
पुलकाती है
हरिवल्लभी पद्म हस्ता मां लक्ष्मी
गौरी तनय गणेश
हंस वाहिनी वीणा वादिनी मां सरस्वती
आप सभी का
कल्याण करें
शुभ दीपावली
शुभम् करोती कल्याणम


