सितार
'आइए आइए '
अपने ड्रॉइंग रूम का दरवाजा खोलते हुए मोहन जी बोले
'स्वागत है आपका'
'धन्यवाद सर '
हाथ मिलाते हुए सुमित ने कहा
सुमित अपनी पत्नी विनीता के साथ अपने पूर्व परिचित मोहन जी से मिलने आया है।
मोहन जी एक कंपनी में बड़े पद पर कार्यरत हैं।पिछले महीने ही यहां शिफ्ट हुए हैं।परिवार अभी तक नहीं आया है। बच्चों के एग्जाम के बाद ही शिफ्ट होगा।
मिलने का दिन और समय पहले से ही तय था। सुमित कुछ ज्यादा ही उत्सुक लग रहा था और विनीता को समय का ध्यान रखने के लिए भी बार- बार टोक रहा था।
'सुनो अच्छे से तैयार हो जाना
समय से पूर्व ही पहुंचना होगा।
बड़े आदमी हैं उन्हें सौ काम रहते हैं।'
'जी जरूर '
उसने सिर हिलाते हुए कहा
फिर वो जल्दी जल्दी घर के सारे काम निपटाने में लग गई
'कितना समय लगेगा हमें वहां'
उसने पूछा
'देखते हैं कि वो हमें कितना समय देते हैं।'
तैयार हो कर विनीता हाल में पहुंची
'कैसी लग रही हूं?' उसने पूछा
'ठीक है अब चलो भी '
सुमित थोड़ा चिढ़कर बोला
विनीता ने गुलाबी रंग की चंदेरी साड़ी पहनी थी और हल्का सा मेकअप भी किया था
'क्यों ठीक है
ना मेकअप ज्यादा तो नहीं है?'
उसने फिर पूछा
सुमित के मोहन जी के बारे में सुन सुन कर
विनीता कुछ नर्वस सा महसूस कर रही थी
'हां सब ठीक है कहा तो'
बहुत ही रूटीन सा जवाब दिया सुमित ने
वो तय समय से पहले ही वहां पहुंच गए थे। मोहन जी शायद अभी रेस्ट कर रहे थे। उन्हें देख कर लग रहा था
'आप लोग बैठिए मै अभी आया'
कह कर वो अंदर चले गए।
विनीता ने उनके ड्रॉइंग रूम में नजर दौड़ाई
बेहद सादगी और संजीदगी से सजा हुआ पर बहुत भव्य लग रहा था।कमरे के एक कोने में रखे सितार देख कर वो चौंक गई
पर तभी मोहन जी वापिस आ गए।
'और सुनाओ सुमित क्या हाल चाल?'
'जी सब कुशल मंगल '
'कहिए क्या लेंगे' आप लोग उन्होंने पूछा
'जी कुछ नहीं'
'अरे भई इतनी औचारिकताएं किस लिए ' वो बोले
'चाय या कॉफी क्या चलेगा?'
'जी चाय '
'अरे हमारे यहां की कॉफी पीकर देखो दीपक बहुत अच्छी कॉफी बनाता है।'
और फिर उत्तर का बिना इंतजार किए उन्होंने अपने कुक को अच्छी कॉफी लाने को कहा
इधर उधर की और पिछली नौकरी के बारे में बात होती रही ।
'आज कल बहुत मुश्किल होता जा रहा है।जितनी ऊंची पोस्ट उतना ही ज्यादा काम का तनाव ' वो कहने लगे।
'जी सो तो है।'
सुमित भी अपनी समस्याएं उन्हें बताने लगा
'जी सर मेरा भी काम कुछ ठीक नहीं चल रहा ।'
उसने सकुचाते हुए कहा
'क्यों क्या हुआ?'
'सर जॉब नहीं है बिल्कुल खाली बैठा हूं आजकल' ?
'अरे!कब से'
वो थोड़े उपेक्षित भाव से बोले
'सर बाबूजी की तबीयत की वजह से मै काम पर ध्यान नहीं दे पा रहा था ।
फिर आए दिन उन्हें हॉस्पिटल भी ले जाना पड़ता था तो छुट्टी भी लेनी पड़ती थी बस सर चल नहीं पाया वहां।'
'फिर घर कैसे चलता है?" उन्होंने पूछा
"विनीता का जॉब है एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती है ।
और शाम को ट्यूशन भी लेती हैं संगीत सिखाती है कुछ बच्चे आते हैं आस पड़ोस से।"
विनीता मूक दर्शक बनी उनकी बातें सुन रही थी अपना नाम सुनकर चौंक गई
"अरे वाह आप संगीत सिखाती हैं !"
विनीता की ओर रुख करते हुए मोहन जी बोले
"जी सर थोड़ा बहुत"
"क्या सिखाती हैं आप ?"
"जी सितार सीखा था पर अब नहीं बजाती!"
"अरे वाह !क्या बात है पर बजाना क्यों बंद कर दिया?"
"जी सितार में अब वैसी रुचि नहीं रही
रियाज भी छूट गया है।"
विनीता जैसे इस टॉपिक को खत्म करना चाहती थी
तभी कॉफी आ गई उनके हेल्पर ने करीने से मेज़ पर नास्ता और कॉफी रख दी
"लीजिए आप लोग"
"जी "
वो सब कॉफी पीने लगे और विनीता अपने सुरीले अतीत में खो गई
कितने मनोयोग से सीखा था उसने सितार कभी मां तो कभी बाबा उसे सितार की क्लास के लिए लेकर जाते थे
मां बाबा ने कितने प्यार से उसके लिए सितार खरीदा था।वो जब भी साधना करती वे लोग बहुत खुश होते थे।
पर शादी के बाद सब बंद हो गया
सुमित को पसंद नहीं था।जब भी वो रियाज़ के लिए सितार उठाती तो सुमित झल्ला कर बोलता
"तुम्हें अपने शौक अपने मायके में ही छोड़ कर आने थे। "
"भले घर की लड़कियां घर संभालती हैं ना कि ये फालतू के बेहूदा से शौक
मुझे पसंद नहीं है ये सब"
सुमित की नापसंदगी उसकी सनक बन चुकी थी। आए दिन झगड़े होने लगे, तो उसने गुस्से में आकर अपना सितार मायके भिजवा दिया था।
तभी अनायास फोन की घंटी बजी और वो अतीत से वर्तमान में आ गिरी
फोन पर मोहन जी किसी से बोल रहे थे
"ठीक है। अभी पहुंचता हूं।"
फिर उन लोगों से क्षमा मांगते हुए बोले
"कुछ अर्जेंट काम से ऑफिस जाना है आप लोग बैठिए मै अभी आता हूं।"
"सर हम भी निकलते हैं।"
"अरे नहीं भई!"
"तुम लोग रुको डिनर करके जाना शादी के बाद पहली बार आए हो।"
"ऐसा करो सुमित तुम भी चलो साथ में" वो बोले
और फिर सुमित को लेकर आनन फानन में वहां से चले गए।
विनीता इंतज़ार करती रही दो घंटे बीत चुके थे उसे बोरियत होने लगी थी।
करे भी तो क्या करे शेल्फ में रखी पुस्तकों को भी उलट पलट लिया था उसने ।
फिर पता नहीं किस मन स्थिति में
अचानक से उसने सितार उठाया और उसके तार साधने लगी।
जब से सितार देखा था उसका मन उसे छूने का होने लगा था
इतने लंबे अंतराल के बाद सितार के तार छेड़ कर उसे तो असीम आनन्द की अनुभूति हो रही थी
वो सितार बजाने में इतनी मगन हो गई कि उसे पता ही नहीं चला कि कब मोहन जी और सुमित वहां आ गए।
सुमित की पुकार से उसकी तंद्रा भंग हुई
"जी सॉरी सर!
वो सितार देख कर रोक नहीं पाई खुद को"
अरे भई इसमें सॉरी की क्या बात है
बल्कि उल्टे सितार धन्य हो गया कि कोई साधक तो मिला उसे
मैं तो बजा नहीं पाता बस ड्रॉइंग रूम का सजावटी सामान हो कर रह गया है
वो बोले और आप तो बहुत सुरीला बजा रहीं थीं
मैं तो मंत्र मुग्ध होकर देख रहा था
विनीता झेंप गई अपनी नादानी पर
अब घर पहुंच कर सुमित भी झगड़ा करेंगे सो अलग।
चलिए खाना खाते हैं मोहन जी ने माहौल को सहज करते हुए कहा
डिनर टेबल पर लग चुका था
तीनों ने साथ बैठकर खाया हंसी मजाक भी हो रहा था
पर विनीता को मन बहुत व्यथित था उसका मन उनकी बातों में नहीं था
वो तो आसन्न झगड़ा और तनाव के बारे में ही सोच रही थी
"पोस्ट डिनर कॉफी हो जाए"
मोहन जी ने पूछा
"नहीं सर अब हम चलेंगे" सुमित बोला
"बहुत समय ले लिया आपका"
"अरे नहीं मुझे तो बल्कि अच्छा लगा।"
"भाभीजी का सितार सुनकर तो आनंद आ गया। "
"फिर आइएगा।"
वो दरवाजे तक छोड़ने आए
"Ok thanks for coming सुमित
Thanks for Beautiful evening ."
"गुड नाईट सर"
वो जब घर पहुंचे बहुत रात हो चुकी थी
विनीता सोच रही थी कि अभी तक सुमित ने कुछ कहा क्यों नहीं। अब तक तो प्रवचन चालू हो जाने थे। वो भी बात करना नहीं चाहती थी। थक भी चुकी थी सो बिस्तर पर लेटते ही सो गई।
अगले दिन सुमित की नींद फोन की घंटी से खुली
"बधाई हो सुमित तुम्हारी नौकरी के लिए मैंने बोल दिया है तुम्हें आज ही ज्वॉइन करना होगा ।"
"जी सर"
"थैंक यू सर"
"मै किन शब्दों में आपका शुक्रिया अदा करुं?"
सुमित बोले जा रहा था
"मिलते हैं फिर "
उधर से आवाज आई
तभी विनीता चाय लेकर कमरे में पहुंची
"क्यों क्या हुआ किसका फोन था
बड़े खुश नजर आ रहे हों?"
"अरे मोहन सर का"
"उन्होंने मेरे लिए नौकरी की बात कर ली है।
आज से ज्वॉइन करना है।"
"वाह ये तो बहुत अच्छी खबर है!"
विनीता ने चहकते हुए कहा
"अरे मैं तो तभी समझ गया था जब वो तुम्हें सितार बजाते हुए घूर घूर कर देख रहे थे।तुम इतनी मगन थी कि तुम्हें तो होश ही नहीं था।"
विनीता को तो काटो तो खून नहीं
"अरे आप ने टोका क्यों नहीं?"
"छोड़ो भी ना"
"मुझे अभी निकलना होगा पहला दिन है ऑफिस का
मै लेट नहीं होना चाहता"
"और हां आज ही अपना सितार मंगवा लेना।
बाबा दे जाएंगे।
मोहन सर को सितार सिखाने जाना होगा
शाम के ट्यूशन बंद कर देना
रियाज़ भी तो करना होगा तुम्हें।"
"अरे नहीं ये क्या कह रहे हैं आप ?
आप के कहने पर मैंने तो सितार कब का छोड़ दिया।"
"अब मैं ही कह रहा हूं बजाने के लिए
तो मना क्यों कर रही हो। "
"देखो मेरी नौकरी का सवाल है।"
सुमित बोलता हुआ निकल गया।
विनीता अब समझ चुकी थी कि वो जब अपनी साधना में लीन थी वहां उपस्थित श्रोता उसके संगीत सुनकर मंत्रमुग्ध नहीं हुए थे।
मां ठीक ही कहती थी कि सुर साधना समय और स्थान देख कर ही करना
चाहिए। सुर साधना तो ईश्वर अराधना होती है।
उसे आत्म ग्लानि होने लगी और वो रोए जा रही थी खुद को कोस रही थी कि वो सितार के मोह में पड़ी । क्यों वो सितार को छू लेने का लोभ संभरण नहीं कर पाई । कलुषित भावों से सुर साधना तो पाप है।
उसके मन मस्तिष्क में एक ही प्रश्न था
क्या जरूरत थी
उसने वो सितार उठाया ही क्यों?

