तम्हें पता है ना
जब उगता है सूरज
तो गाते हैं विहग्वृंद
जब खिलते हैं फूल
मंडराती हैं तितलियाँ
जब छाते हैं बादल
तो नाचता है मोर
झरते हैं सुगंधित प्रसून
प्रियतम से यूँ होता मिलन
जब बहती है पवन
तो दहकती है आग
जब बरसते हैं मेघ
तो महकती है धरती
निकलता है रजत चांद
बहकती है मदभरी रात
जब फूटता है झरना
बजता है जलतरंग
बरसती है बूंद स्वाति में
बनते हैं मोती सीपी में
चमकती है निर्मल चांदनी
गाता है चंचल चकोर
बहती है अविरल नदी
तैरती हैं मगन मीन
देखती हैं पूनम चांद
उछलती हैं उदंड लहरें
जब हंसते हैं बच्चे
छाता है इन्द्रधनुष
हरियाते हैं घने जंगल
खेलते हैं सिंह शावक
मिलते हैं दो जोड़ी नयन
धडकते हैं प्रेम में डूबे ह्रदय
मचलते हैं सतरंगी सपने
खिलखिलाता है अतृप्त मन
हँसती है जब प्रेमिली रात
गिनती हैं तारे रतजगी आंख
चमकते हैं अन्धेरे में जुगनूं
गुदगुदाती हैं प्रियतम की याद
सजती संवारती हैं लड़कियाँ
गुनगुनाते घुमते हैं लड़के
तपता है धरती का आंगन
झूम के आता है फिर सावन
बजती के कृष्ण की बंशी
राधा संग नाचती के गोपियां
अनंत प्रेम के अनंत प्रतीक
प्रेम प्रतिविम्बित होता सृष्टि में
प्रेमपंथीयों ने पढ़ रखी है
ढाई आखर प्रेम की बोली
प्रेम कस्तूरी हृदयंगम है
बिना इत्र के महके जीवन
मधुशाला के रसिक पथिक हैं
झूमें पीकर प्रेम की हाला
तन मन में मादकता भर दे
महुआ जैसा होता है प्रेम
प्रेषित होती है स्पर्श भाव से
शब्द रहित है प्रेम की भाषा
तुम कभी भी उधौ मत होना
समझ सको ना प्रेम की भाषा

