पढ़ सको तो ठहर के पढ़ना

प्रकृति में प्रेम प्रतीकों की ये भाषा


कली के कोमल कपोलों पर

प्रेम का प्रथम स्पर्श करते ओस बिंदु


श्वेत श्याम बादलों की दीवार पे धूप से

उकेरा हुआ इन्द्रधनुष


घने छायादार वृक्ष की शाख पे

बूंद बूंद शहद बटोरता प्रणय नीड़


स्याह रात की कालिमा पोंछ

स्वर्ण नदी में भोर निहारता सूरज


खिली कलियों से महक चुरा के

बिखेरता मंद सुगंध समीर


नर्म ओस से भीगी हरी घास पे

झरता हुआ पारिजात 


अलसायी भोर में अधखिले फूलों पे

मंडराते बाबरे भंवरे


पेड़ की टहनी पे टिकी

पुष्पगुच्छों से लदी मधुमालती


अकेली उदास रात से बतियाने जमीं पे

उतरे चांद तारों का जमघट


चाँद की मादक रोशनी में नहाकर

महकती रात की रानी


फूलों से रंग ले अपने पंखों पे मलती

मतवाली मगन तितलियां


मृग छौनों सी कुलांचों से मन मोहते

स्वप्न भरे नयन


बरसते सावन में बाली उमर के झूले पे

प्रेम की पींग बढ़ाता विभोर मन


निश्छल नवल प्रेम प्रसंगों से

मादक मकरंद घोलती तरुणाई


नीलवर्ण गगन में स्वच्छंद विचरते

विहगों के मधुर वृन्द गान


शांत नदी में परस्पर वार्तालापों ने

लीन तैरते हंसों की जोड़ी


तिनका तिनका बीन तन्मयता से

घोंसला बुनते प्रेमी युगल


ख़ुशबू से महकता मुंह में घुलता

गिलौरी में गुलकन्द सा प्यार


थकी मांदी मुहाने पे पहुंची नदी के

साथ सागर में डूबता सूर्य


बरसती बूंदों की सोंधी गंध में

नाचता मन का मयूरा


कृष्ण मुरली से निकलती राधा धुन पे

रास में मगन गोपिका वृन्द


सर्वव्यापी प्रेम की कहानियां

प्रकृति के हर पन्ने पे अंकित है

अनंत प्रेम की अनंत कथायें


गढ़ सको तो अवश्य ही रचना

निज प्रेम की नित नूतन निज गाथायें