पीड़ा से
व्यथित हो
पर शब्द ना हो
मन इतना भी
परतन्त्र ना हो
लिप्सा का
आरंभ हो
और अंत ना हो
मन इतना भी
स्वतंत्र ना हो
काव्य हो
कला हो
और रसिक ना हो
इतना रसहीन
संसार ना हो
प्रेम से आल्हादित
ह्रदय हो
और परावर्तन ना हो
इतना शुष्क भी
भाव ना हो
चांद सूरज तारों से
भरा आकाश हो
और प्रकाश ना हो
इतना तमस भरा भी
अवसाद ना हो
कृष्ण हो
राधा हो
और मीरा ना हो
इतना अधूरा भी
प्रेम ना हो
खिलते फूल, पंछी
तितलियाँ हो
और श्वेत श्याम में
सीमित हो
इतना बेरंगा भी
दृष्टिकोण ना हो
हरा भरा
लम्बा तना हो
और छाया ना दे
इतना उँचाई वाला भी
कोई वृक्ष ना हो
मन में उतारकर
मन से ही उतार दे
असहमति का स्वीकार्यता ना हो
इतना उथला भी
प्रेम ना हो
प्रभु श्री राम हो
अग्निपरीक्षा को
विवश सीता हो
इतना सतयुगी भी
रामराज्य ना हो


