
पीड़ा से
व्यथित हो
पर शब्द ना हो
मन इतना भी
परतन्त्र ना हो
लिप्सा का
आरंभ हो
और अंत ना हो
मन इतना भी
स्वतंत्र ना हो
काव्य हो
कला हो
और रसिक ना हो
इतना रसहीन
संसार ना हो
प्रेम से आल्हादित
ह्रदय हो
और परावर्तन ना हो
इतना शुष्क भी
भाव ना हो
चांद सूरज तारों से
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